नेता जी की होशियारी पड़ती नेता जी पर भारी

 

राजाओ का जलवा

हमारा देश का इतिहास सैकड़ो वर्ष हज़ारो वर्ष पुराना है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसमें समय काल और परिस्थिति के अनुसार बदलाव होते रहे है | और भारत के जनता जनार्दन  इस व्यवस्था को सहर्ष स्वीकार करते रहे है , जिसके कारण जनता को वक़्त वे वक़्त बहुत बड़ी मुश्किलों से भी जूझना पड़ा लेकिन हिंदुस्तानी आवाम कभी उफ़ तक नहीं किया , पहले राजतंत्र में राजा सर्वोपरि होती थी और राजा अपने हिसाब से तंत्र का निर्माण करते थे ताकि उन्हें शासन करने या अपने विरोधियो को साधने में कोई परेशानी न हो , और इस व्यवस्था में बहुत से राजा ऐसे हुए जो हिंदुस्तान के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षर से दर्ज करवा गए , जिसमे प्रमुख नाम महाराणा प्रताप, चन्द्रगुप्त , हर्षवर्धन ,सम्राट अशोक  थे , इन्होने अपने काल में बहुत सही तरीके से अपने साम्राज्य को संभाला |

मुगलो से लेकर अंग्रेजो की शासन व्यवस्था

भारत हमेशा से स्वाबलंबी रहा है , किन्तु समय समय पर ऐसे ऐसे लोग पैदा हुए जिसके कारण माँ भारती को लम्बे समय तक गुलामी की जंजीरो में बंध कर रहना पड़ा | मुग़ल हो चाहे डच , पुर्तगाली , अंग्रेज सब के सब आक्रांता थे , उनका मकसद एक ही था ” जहा डाल डाल  पर सोने की चिड़िया करती थी बसेरा ” बस उस सम्पदा को लूटना अस्तव्यस्त  करना , और विश्व को सबसे अच्छी शासन व्यवस्था देने वाली भूमि को सामाजिक,आर्थिक और राजनितिक रूप से पंगु बना देना | लेकिन लम्बे समय तक मुगलो द्वारा अंग्रेजो द्वारा गुलाम बना कर रखने के बाद भी वे  भारत की अस्मिता को समाप्त नहीं कर पाया |

 

लोकतन्त्र की जननी हमारी मातृभूमि

जननी का अर्थ माँ है , लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाने लगा और गणतंत्र की स्थापना हुई। विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का ज्ञान करानेवाला स्‍थान वैशाली ( बिहार ) ही है। आज वैश्विक स्‍तर पर जिस लोकशाही को अपनाया जा रहा है, वह यहाँ के लिच्छवी शासकों की ही देन है। पूरी दुनिया को लोकतंत्र का ज्ञान देने वाली इस भूमि का इतिहास ईसा से 725 वर्ष पुराना है, जब यहां लिच्छवी गणतंत्र था, जिसे वज्जि संघ कहा जाता था। इसमें केंद्रीय कार्यपालिका में एक गणपति यानी राजा, उप राजा, सेनापति तथा भंडागारिक थे। ये ही शासन का कार्य देखते थे। पूरी व्यवस्था बिलकुल आज के संसद की तरह थी। वास्तव में सारी दुनिया ने लोकतंत्र की प्रेरणा यहीं से ली। महात्मा बुद्ध भी वैशाली के इस वज्जि संघ से बहुत प्रभावित थे।

आज़ादी के बाद का लोकतंत्र 

सैकड़ो वर्षो की गुलामी के बाद हमें आज़ादी मिली , अनेको हमारे पूर्वजो ने कुर्बानी दी देश को आज़ाद कराने में बहुत सारी कठिनाइयों से जूझना पड़ा , फिर जाकर हमने आज़ादी पाई | जब हमारा देश आज़ाद हुआ उस समय अंग्रेजो ने ऐसी लीला रच डाली की हमारा देश दो टुकड़ो में बँट गया , मार काट से भरपूर परिस्थिति और रक्त से लाल धूसर युक्त आज़ादी मिली | आज़ादी के बाद जो शासन प्रणाली अपनाई गई वही प्रणाली अभी तक सशक्त रूप से चल रही है | लेकिन कहते है न हरेक चीजों का समय समय पर अपडेशन न हो तो उसमे बहुत सारी अवांछित चीजों का समावेश हो जाता है | आज हम जिस तरफ आप लोगो का ध्यान आकर्षित करना चाह रहे है वो है बहुत छोटी चीज परन्तु आज के दौर में शासन तथा शासक को बनाए और बने शासक को उखाड़ फेकने के लिए काफी है |

आज का दौर शासन को चलाने और अंगद के तरह पैर जमा जमा चुके नेताओ के लिए भी खतरे की घंटी बन चुकी है परन्तु अभी एहसास हुआ नहीं बल्कि अब होना शुरू हो चूका | हमारे देश की दो बड़ी पार्टी  भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी के साथ साथ अनेको पार्टी अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे है , अभी पार्टी के शीर्षस्थ नेता चुनावी दौर में अपने को  चाणक्य समझने की भूल कर रहे है की पार्टी कार्यकर्त्ता को ही मिस यूज  करना शुरू कर दिए किसी पार्टी के लिए कार्यकर्त्ता कोई एहमियत ही नहीं समझने की भूल करने लगे है | चुनाव आते ही अपने टिकट चाहने वालो की लम्बी फेहरिस्त को देख कर मन में लड्डू फूटने लगते और सबको बिभिन्न माध्यमों से विश्वाश दिलाने में कामयाब हो जाते की टिकट आपको ही दिया जायेगा | कार्यकर्त्ता पुरे जोरशोर से चुनावी माहौल बनाने में लग जाते , अपनी क्षमता अनुसार खर्च भी करते ऐसे प्रत्यासियो की संख्या काफी हो जाती सब आपस में जोर लगाते लेकिन टिकट तो एक ही है | जब पार्टी किसी एक को टिकट देती तो बांकी कार्यकर्त्ता जो उम्मीद में करोड़ो फूक  चुके होते हैं | वो ठगा हुआ महसूस करते , और पार्टी के खिलाफ  ही ताल थोक देते जिससे पार्टी का काफी नुकसान होता और हमने तो बहुत जगह बुरी तरह  हारते देखा , पार्टी नेतृव अपनी धूर्तता के बल पे और पार्टी फण्ड को बचाने के चक्कर में और कार्यकर्त्ता के पैसे से माहौल बनाने के चक्कर में पार्टी का बहुत बड़ा नुकसान कर चुके होते हैं | क्युकी कार्यकर्ता ही किसी भी पार्टी की रीढ़ की हड्डी होती है , इसे समझना होगा |

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