सड़के खामोश और संसद आवारा

आखिर नंबर 1  और  नंबर 2 की महत्वाकांक्षा कैसे ले डूबी दिल्ली  को

 

 

पृथ्वी पर कभी कभी कुछ लोग कुछ नाम करने को पैदा होते लेकिन  कुछ बदनाम  करने को पैदा होते जी हाँ हम बात कर रहे है दिल्ली के वो दो धूर्त धुरंधर जिसने दिल्ली ही नहीं पुरे देश को अपने मोहफांस में फसा लिया था | बात शुरू होती है अन्ना आंदोलन 16 अगस्त 2011 से जब देश में एक आंधी सी बह रही थी | पुरे देश में अन्ना के सत्य की मशाल जलती हुई दिखाई दे रही थी | लेकिन डगर इतना आसान  नहीं था |अन्ना आंदोलन जो 16 अगस्त 2011 से 28 अगस्त 2011 तक चला ऐसे मानो की पूरा देश एक सुसुप्ता अवस्था को छोड़ एक नई उम्मीद और विश्वास के साथ खड़ा हो गया , इस आंदोलन ने तो मानो पूरी संसद को हिला कर रख दिया | UPA-2 का शासनकाल लगातार निरंकुशता का परिचय दे रहा  था, लेकिन इस आंदोलन ने साबित कर दिया की लोकतंत्र में जनता ही मालिक है |

भारतीय राजनीती के योद्धा  राम मनोहर लोहिया जी ने कहा था –

” जब सड़के खामोश हो जायेगा तो संसद आवारा हो जाएगी ”

 

सड़क से लेकर संसद तक घमासान

 

UPA-2 का शासन आवारागर्दी के रस्ते पर चल चुकी थी सब बेलगाम उसका कारण देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का पूरी तरह से चुप्पी साध लेना  चारो ओर बस घोटाले ही घोटाले सुनाई देने लगा, कामनवेल्थ घोटाला , 2G ,3G घोटाला, कोलगेट घोटाला  पता नहीं कितने घोटाले कर डाले, ठीक उसी वक़्त अन्ना का आगमन हुआ जो महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि के रहने वाले थे , उन्होंने देश को जगाने का बीड़ा उठाया, काम समय में  अन्ना ने मानो UPA  सरकार के नाक में नकेल ही डाल दिया | सरकार बिलकुल फस चुकी थी, बीजेपी जो मुख्य विपक्ष की पार्टी थी उसने भी अप्रत्यक्ष रूप से अन्ना का समर्थन कर दिया था | जिसका फायदा बीजेपी को भी भर भर के मिला देश में बीजेपी की सरकार बन  गई  परन्तु आज बीजेपी भी बिलकुल उसी राह पर चल चुकी जिस राह पर UPA चल रही थी | आंदोलन इतना उग्र हो चूका था की  24 अगस्त को प्रधानमंत्री आवास घेरने की तयारी हो गई , 25 अगस्त को जनलोकपाल के मुद्दे पर संसद में बहस हुई और संसद से अपील की गई की अन्ना अनशन तोड़े लेकिन अन्ना अड़े रहे , 27 अगस्त को अन्ना टीम ने बीजेपी से बात करने के बाद ये घोषणा की कि सरकार गुमराह कर रही है संसद में वोटिंग कराइ जाये | 28 अगस्त को अन्ना ने अपना अनशन समाप्त कर दिया |

 

अन्ना से मतभेद पार्टी कि स्थापना

 

अन्ना भी नहीं समझ पाए कि उनके शागिर्द कितने महत्वाकांछी और कितने अंदर से काले है , जब अन्ना ने साफ मना कर दिया कि इस आंदोलन का मकसद कभी कोई राजनितिक लाभ लेना नहीं कोई पार्टी बनाना नही , सिर्फ एक सुधारवादी आंदोलन के रूप में ये आंदोलन जाना जाये , लेकिन अन्ना टीम का कही पे निगाहे कही पे निशाना था, पूरी टीम ने अन्ना को दरकिनार करते हुए 26 नवंबर 2012 को एक पार्टी कि स्थापना कर डाली जिसका नाम “आम आदमी पार्टी ” रखा गया  , जिसमे प्रमुख चेहरा योगेंद्र यादव ,प्रशांत भूषण , कुमार विश्वास , अरविन्द केजरीवाल , मनीष सिसोदिया , प्रोफ़ेसर आनंद कुमार प्रमुख थे |

अनगिनत धोखे है इस राह में

 

अन्ना के साथ ये पहला धोखा था , फिर पार्टी का गठन हुआ थोड़े समय बाद पार्टी के अंदर कलह कि बू आने लगी , और अरविन्द केजरीवाल अपने को पार्टी का सर्वेसर्वा समझने लगे  शायद ये उनके जिंदगी कि सबसे बड़ी भूल सावित हुई ,वक़्त बीतता गया पार्टी के फाउंडर सदस्य और बड़े चेहरे को इस बात कि बू आने लगी कि कुछ तो गड़बड़ है , क्युकी अरविन्द अपनी मनमानी से बाज नहीं आ रहे थे और अपने सुननेवाले को ज्यादा तरजीह देने लगे यही कारण रहा कि एक एक कर बड़े चेहरे बगावती सुर छेड़ दिए , इन बड़े चेहरों में  सबसे पहला और सबसे प्रमुख

A) विनोद कुमार बिन्नी

ये आम आदमी पार्टी के पहले  शख्श थे जिन्होंने विरोध कि आवाज़ सबसे पहले बुलंद कि ये लक्ष्मी नगर से चुनाव जीते थे , इससे पहले ये निगम पार्षद भी रह चुके थे ये काफी अनुभवी और आम आदमी पार्टी को दिल्ली में पहचान दिलाने में अग्रणी भूमिका में रहे और दिल्ली में मोहल्ला क्लिनिक का आईडिया इन्ही का था | जो अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली में मोहल्ला क्लिनिक बनवाया और पूरा का पूरा श्रेय अपने को दिया |

B) शांति भूषण

ये महोदय आम आदमी पार्टी के सबसे पहले चंदा देने वाले पूर्व कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वकील जिन्होंने पार्टी की स्थापना के लिए उस वक़्त आज से 12-13 वर्ष पूर्व 1 करोड़ का चंदा दिया जो पार्टी को सींचने से  लेकर बढ़ाने तक संजीवनी का काम किया इन्होने भी अरविन्द पर अनुभवहीन और टिकट बटवारे में धांधली जैसे आरोप लगा कर पार्टी से अलग हो गए |

C) प्रशांत भूषण

ये महोदय शांति भूषण के पुत्र है और आम आदमी पार्टी के थिंक टैंक कहे जाते थे , इन्हे PAC  का सदस्य भी बनाया गया था लेकिन दिल्ली चुनाव के अरविन्द की दादागिरी इनपे भी भारी पड़ी जब इन्होने अपनी बात रखी तो अहंकार में चूर अरविन्द ने इसे पद से तुरंत बर्खास्त किया और  पार्टी के प्राथमिक सदस्य से भी निकाल बाहर फेक  दिया |इन्होने पार्टी को अर्श से फर्श तक पहुंचाने में  महत्वपूर्ण भूमिका अदा किये थे |

D) योगेंद्र यादव

ये महोदय राजनितिक विचारक है , आम आदमी पार्टी बनाने में अहम् रोल अदा किये , ये पार्टी के  चुनावी रणनीतिकार भी थे , इन्होने भी पार्टी की मजबूती के लिए अनेको कदम उठाये , लेकिन केजरीवाल की अक्खर नीति ने इन्हे भी परेशान कर दिया , जैसे ही इन्होने पार्टी के लिए पार्टी हित में बात रखी तो इन्हे भी लात मारकर पार्टी के प्राथमिक सदस्यता से भी वंचित कर दिया गया |

E) कपिल मिश्रा

आम आदमी पार्टी के सबसे ऊर्जावान कार्यकर्त्ता मुखर आवाज  में से एक थे  कपिल मिश्रा, ये  हमेशा पार्टी के लिए फायर ब्रांड नेता रहे | अपने बयानों  से हमेश सुर्खिया बटोरते रहे  , दिल्ली में सरकार बनने के बाद इनको अहम् विभाग जल संसाधन मंत्री बनाया गया | पर ये केजरीवाल के आँख में आँख डालकर बात करने वालो में से थे फिर क्या था , कुछ समय बाद ही मंत्रालय वापिस ले लिया गया , और पार्टी से लात मारकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया | फिर उन्होंने बीजेपी की और रुख किया और आज दिल्ली सरकार में सांस्कृतिक मंत्री बने हुए है |

F) शाजिया इल्मी

पत्रकारिता छोड़ शजिया अन्ना आंदोलन से जुडी , बाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी बनाई गई , पर आम आदमी पार्टी में महिलाओ की दुर्दशा को देखकर इनका मोह भांग हो गया , और आरोप लगाई की आम आदमी पार्टी में लोकतंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं है , इतना होते ही पार्टी ने इनको बाहर निकाल कर फेक दिया |

G) प्रोफ़ेसर आनंद कुमार

समाजशात्री प्रोफ़ेसर आनंद कुमार जो आम आदमी पार्टी के फाउंडर सदस्य थे और शुरुआत से ही हर सुख दुःख में पार्टी के साथ डटे रहे लेकिन अरविन्द इन्हे पार्टी विरोधी गतिविधि में संलिप्तता का आरोप लगाकर पार्टी से बहार फेक दिया |

H) मयंक गाँधी

सामाजिक कार्यकर्ता मयंक गाँधी ने अरविन्द का खूब साथ  दिया , ये पार्टी के कोर कमिटी के सदस्य भी रहे ,  बाद में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने लेकिन प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के बाहर किये जाने पर इन्होने पुरजोर तरीके से सवाल खड़े किये , जो अरविन्द को नागवार गुजरा और इन्हे तुरंत पार्टी से निकाल के फेक दिया |

I) आशुतोष

पत्रकारिता छोड़ राजनीती में किस्मतआजमाने वाले आशुतोष का राजनीती से जल्द ही मोहभंग हो गया और जल्द ही पार्टी से निकाल बाहर कर दिए गए |

 

लेकिन आज आम आदमी पार्टी में वही बने हुए  है जिन्हें केवल  केजरीवाल का पिट्ठू बनकर रहना  पसंद है |  इसका सबसे बड़ा उदाहरण मनीष सिसोदिया है , दिल्ली के इतिहास में अरविन्द पहले मुख्यमंत्री है जो ( CM  WITHOUT  PORTFOLIO)  था , सारे बड़े विभाग अपने पिट्ठू मनीष के कंधो पर डाल रखा था वो भी पिछले रिकॉर्ड को देख कर गधो की तरह ढेंचू ढेंचू कर रहा था , अरविन्द खुद अपने को पढ़ा लिखा कहता पर इतनी समझ नहीं है की किसी भी  एक व्यक्ति को शराब मंत्री और शिक्षा मंत्री नहीं बना सकते | दोनों अलग अलग चीजे है पर अपने पाले हुए पिट्ठू सबसे उपयुक्त लगे और जिम्मेदारी सोप दी | मनीष न करने का दुःसाहस तो कर ही नहीं सकता , परिणाम सबके सामने है जब दिल्ली करोना के कहर से कराह रही थी तो ये पिट्ठू शराब से कितना मुनाफा खोरी कर सकते उसमे व्यस्त था | वो तो भला हो केंद्र सरकार और देश के गृहमंत्री अमित शाह जी का जो दिल्ली के मुख्यमंत्री की अच्छे से खबर ली , और दिल्ली की जनता की सुध लेकर दिल्ली की सुरक्षा की |

मनीष सिसोदिया सबसे ज्यादा करीबी सबसे ज्यादा विभाग सबसे ज्यादा बफादार होने के बाद भी सबसे बड़ा विलेन बना हुआ है , लम्बे समय  जेल भोगने के बाद , बड़ी मुश्किल से बेल मिली, आज जब  भ्रष्ट अरविन्द ने जब इस्तीफा दिया तो  सबकी नज़र नंबर 2 मनीष पर टिकी थी होना भी यही चाहिए था | पर नंबर 1 की लोलुपता कहाँ  संवेदनाये समझती, उन्होंने पहले ही घोषणा कर दिया की नंबर 2 का कोई चांस नहीं है , फिर नए पिट्ठुओं में सबसे प्रमुख आतिशी जो नंबर 2 के जगह पे काम भी कर रही थी इसलिए आनन फानन में दिल्ली को 3-4 महीने के लिए एक डमी मुख्यमंत्री दे दिया गया , जो मुख्यमंत्री के लिए कही से फिट नहीं बैठती , और पुरे दिल्ली वाले नंबर 1 की हरकतों से काफी अचम्भित रही | और परिणाम ये हुआ की दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को ही दिल्ली की सत्ता से बेदखल कर दिया | आज पूरी पार्टी पुरे देश में हासिये पर चली गई है |

“कहावत है जैसी करनी वैसी ही भरनी”

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