
आरएसएस भारत का एक हिन्दू राष्ट्रवादी अर्धसैनिक संगठन है | जो आज भारत का एक प्रमुख सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन माना जाता है , जिसकी स्थापना 1925 में हुई थी। इसका मूल उद्देश्य “राष्ट्र निर्माण” और “सांस्कृतिक एकता” कायम रखना रहा है। अगर बीबीसी की माने तो ये विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है |समय के साथ यह संगठन बहुत व्यापक हुआ है और इसके विचारों का असर राजनीति, समाज और शिक्षा तक देखा जाता है। जो व्यापक रूप से भारत के सत्ता रूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी का पैतृक संगठन माना जाता है | पिछले 12 वर्षो से भारतीय जनता पार्टी की दमदार सरकार है ऐसे में इसके प्रति बढ़ती उदासीनता और आलोचनात्मकता —दोनों का यु बढ़ जाना गंभीर सवाल पैदा करता है |
क्या RSS के प्रति उदासीनता बढ़ रही है?

कुछ हद तक यह बात सही प्रतीत होती है, खासकर युवा वर्ग में। इसके कई कारण हो सकते हैं | बदलती जीवनशैली
आज की भागमभाग भरी जिंदगी जहाँ बस पैसो की रेस लगी हो, ऐसे में युवा पीढ़ी डिजिटल दुनिया, करियर और निजी विकास में ज्यादा व्यस्त है। हाल के दिनों में सरकारों और सरकारी संस्थानों ने रोजगार सृजन में पूरी तरह से असफल सावित हुए है , युवाओ के सामने रोजगार सबसे अहम् है मोदी सरकार 2 करोड़ युवाओ को रोजगार देने का वादा किया वो भी जुमला निकला , जीवन में इतने मुश्किलात के वावजूद कैसे युवा रोज़ शाखा में जाकर अनुशासन और सामूहिक गतिविधियों में भाग ले ? ये सब उन्हें उतना आकर्षक नहीं लगता।
संगठन की पारंपरिक छवि

समय के साथ अपडेशन बहुत जरुरी होता है ये विचार आरएसएस के बड़े बड़े पदाधिकारिओं के दिमाग में क्यों नहीं आ रहा , अभी भी वही तरीके जो काफी समय से चले आ रहे वही चल रहा| RSS की शाखा प्रणाली पारंपरिक है—दैनिक उपस्थिति, शारीरिक व्यायाम, और वैचारिक चर्चा। ये बड़े ही महत्वपूर्ण है पर नई पीढ़ी को यह मॉडल थोड़ा पुराना लग रहा है |
RSS को अक्सर Bharatiya Janata Party से जोड़ा जाता है। यहाँ तक की आरएसएस को भारतीय जनता पार्टी की पैतृक पार्टी भी कहा जाता है | इससे कुछ लोगों को लगता है कि यह एक “सांस्कृतिक संगठन” के बजाय “राजनीतिक प्रभाव वाला संगठन” बन गया है, जिससे दूरी बनाते है। ये तो सच है न की देश में अभी भी एक बहुत बड़ा तबका भारतीय जनता पार्टी को पसंद नहीं करती है , इसलिए वो आरएसएस से भी परहेज करती है |
समर्थकों का नजरिया

RSS के समर्थक मानते हैं कि संगठन आज भी अपने मूल उद्देश्य—“राष्ट्रवाद” और “भारतीय संस्कृति की रक्षा”—पर कायम है। उनका कहना है कि सेवा कार्य शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत आरएसएस हमेशा बढ़चढ़ कर मदद करता है | समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच बनी है “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” को मजबूत किया जा रहा है| आलोचक मानते हैं कि RSS का फोकस अब ज्यादा राजनीतिक हो गया है ,सांस्कृतिक गतिविधियों की बजाय सत्ता से जुड़ाव बढ़ा है ,इससे उसका मूल सामाजिक-सांस्कृतिक चरित्र कमजोर हुआ है ,क्या RSS भारतीय संस्कृति पर “कुठाराघात” कर रहा है? यह दावा काफी कठोर है और पूरी तरह से सर्वसम्मति नहीं है।कुछ आलोचकों के अनुसार:
भारत की संस्कृति बहुलतावादी (pluralistic) है—जिसमें कई धर्म, भाषाएं और परंपराएं शामिल हैं यदि किसी एक विचारधारा को “मुख्य संस्कृति” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो यह विविधता को सीमित कर सकता है |वहीं समर्थकों का कहना है:
RSS भारतीय परंपराओं, त्योहारों, और सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देता है “संस्कृति की रक्षा” उसका मुख्य उद्देश्य है, न कि उसका नुकसान |
RSS के प्रति उदासीनता बढ़ने के पीछे सामाजिक और पीढ़ीगत बदलाव एक बड़ा कारण है। वहीं “राष्ट्रवादी एजेंडे से हटना” या “संस्कृति पर कुठाराघात” जैसे आरोप पूरी तरह से दृष्टिकोण पर आधारित हैं।
👉 एक पक्ष इसे राष्ट्र निर्माण का मजबूत माध्यम मानता है
👉 दूसरा पक्ष इसे वैचारिक रूप से सीमित या राजनीतिक प्रभाव वाला संगठन मानता है
इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझना और तथ्यों के आधार पर विचार करना होगा। संघ और सत्ता के गलियारे में बैठे बड़े बड़े आरएसएस के रणनीतिकार को ये समझना पड़ेगा की हाल के दिनों में आरएसएस लगातार बीजेपी यानि राजनितिक दल की भाषा बोल रही है , हाल के दिनों में संघ प्रमुख मोहन भागवत जी का वयान निंदा तो छोड़िये उससे भी गिरा हुआ वयान दे रहे वो समझ ही नहीं रहे की वो कितने बड़े संगठन के प्रमुख है और उनके वयान का समाज पर कितना असर होता है , आज जगह जगह सामाजिक विदुवेष लगातार फ़ैल रहा जिस संस्कृति को बचाने के लिए ये संगठन बना वो समाज को गृहयुद्ध में झोकने को जैसे आतुर है | आरएसएस को समझना पड़ेगा की उसकी नीव 99% सामान्य वर्ग के युवाओ के खून पसीने पर खड़ी हुई है , तपती धुप में घूमने वाला युवा हो या सभाओ में दरी बिछानेवाला और आरएसएस का झंडा धोने वाला वही सामान्य वर्ग का युवा है | जिसके साथ तुम आज गद्दारी कर रहे हो |
सत्ता का नशा और सनातनी द्रोह

ये तो सच है न की आरएसएस हो या बीजेपी बिना सामान्य वर्ग के आपका कोई अस्तित्व न था न है न रहेगा | आरएसएस वाले को सोचना पड़ेगा की सत्ता उनका इस्तेमाल कर रही है , हिन्दू और हिन्दुत्वा का पाठ पढ़नेवाला इफ्तारी में बिरयानी की चाटनेवाले और हिन्दुओ को भरमीत करने वाले दोगले चेहरों को पहचान लिया गया है |

SC/ST एक्ट और अब UGC एक्ट जैसे काला कानून थोप कर जातिगत आग में पुरे देश को झोंककर तुम सत्ता सुख में लिप्त हो , सामान्य वर्ग के युवाओ को दोयम दर्जे का नागरिक बने वाली साडी योजनाए ध्वस्त होगी , 75 वर्षो से सामान्य वर्गों के खिलाफ कानून बना बना कर थक गए तो ये जहर बोना शुरू किया | सामान्य वर्ग ये जहर पी पी कर महादेव बन चूका | तुम्हे पता नहीं है तुम्हारा पतन की शुरुआत हो चुकी है | अगर नहीं सुधरे तो सामान्य वर्ग का साफ साफ कहना है की आरक्षण जैसे तुमने सामान्य वर्ग के लिए आर्थिक आधार पर दिया वही आधार सब के लिए हो , अगर नहीं हुआ तो हमारे दरवाजे तुम्हारे लिए और बीजेपी वालो के लिए बंद है | अगर गलती से तुम्हारे नुमाइंदे आ गए तो लठ में तेल पिलाकर रखे है | तुमको 2 बार पूर्णबहुमत से लाया इसबार भी मजबूती से साथ दिया और इतनी दोगलई? तुम्हारी नौटंकी और छलावे का वक़्त अब खतम हो चूका अब सामान्य वर्ग अपनी लड़ाई खुद लड़ेगा |
